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बीर बभूटी

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क्यूटी क्यूटी चिट्टी ऊटी बीर भबुटी बीर भबुटी  ।  लाल मखमली ,निरमल तन काया जैसे बर्फ से नहा कोई आया आठ पैर, ओर तेज गति किट न सुंदर ऐसा बनाया पहली बारिश मौसम की अभी सुभ देखना इसका कहते सभी कुछ कहते लक्ष्मी अवतारी लाल वस्त्र धारी हितकारी। किट ऐसा न हानि करे जन को दृश्य जिसका हर्षाये मन को विकास तंवर खेड़ी

करोना न डरे ना मरे

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गोलियों से न हथियार से मरे, कैरोना बीमारी न किसी यार से मरे सेनेटाइजर मास्क दोनों रखो जरूरी 6मीटर से बात करो बराबर रखो दूरी हाथ धोबो साबुन से रगड़ रगड़ के घर मे रहो न घूमो बहार अकड़ के धो के खाओ बाहर से आई चीजें सारी, कड़वे काढ़े तरबूज पपीता की लो मात्रा भारी एक्सरसाइज ओर गरम जल नमक से लो उबाल, रखो अपना ख्याल, रखो अपनो का ख्याल विकास तंवर खेड़ी।

खेड़ी तलवाना -वीरभूमि ओर ऐतिहासिक नींव

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पिछले कुछ दिनों से जब मैने महेन्दरगढ़ का इतिहास पढ़ा और जानने की इच्छा हुई तो कुछ ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य सामने आये जो जान कर मेरी आँखे खुली रह गई । असल मे मेरी इच्छा मेरे गांव के इतिहास को जानने की थी मैने काफ़ी कुछ पढ़ा था मेरे गाँव के बारे मे इस के इतिहास के विषय मे जितना मै या गांव के लोग आमतौर पर जानते हैँ यहाँ मैं ज्यादा नहीं लिख पाया विस्तार से आप अगले लेख पढ़ कर समझ पाएंगे। जहाँ तक लोग जानते हैं तंवरा वटी से आये 2राजपूत सरदारों ने खुडाना और खेड़ी गांव बसाये थे. कहा जाता है की खुडाना को पहाड़ की खोद मे बसाया गया था और खुडाना बसाने वाले सरदार खेड़ी वाले तंवर सरदार के बड़े भाई या चाचा कुछ थे क्योंकि वो आयु मे खेड़ी वालों से बड़े थे आज भी खुडाना गांव को बड़े का दर्जा खेड़ी गांव की तरफ से मिला है. खुडाना मे माता चिलाय या कहें की शीतला माता जी का भी मंदिर है जो प्राचीन है और तंवर वंश से जुडा है। तंवर या जाटू  राजपूत जाती समुदाय का ही एक गौत्र है और खेड़ी तलवाना गांव राजपूतों ने ही बसाया हुआ है। आधुनिक खेड़ी की नीव करीब 700साल पहले पड़ी थी जब राजस्थान से आये राजपूतों ने इसे बसाया था.।लेकिन इसका ...

कविताओं में छुपा जीवन -मेरा कवि मन कोरा कागज

मेरा कवि मन एक कोरा कागज  प्रभु छापी अविचलसूंदर रेखा,जिसने भविष्य को देखा, हां मैने भविष्य को देखा,-2 कलयुग काल डरावनी हाल प्राकृतिक ने सब कुछ तोड़ दिया,ज्यों किया बहुत उत्पात मनुज ने एक वायरस ने बुरा हाल किया, शोध दिए सब पेड़ धरा के मा के वस्त्र सिर सार किया, जितने जीवों की हुई हत्या थी सब का बदला उतार लिया,काटे पेड़ सांस के लाले,हे मानव मूर्ख कहलवायेगा गा, ज्ञान और त्यागमय जीवन ऋषियों का याद कब आएगा, बन गया जीव तू नारभकसी खुद का माँस तू खायेगा, जीव के प्रति नहीं रही दया, क्या कहेगा धर्म का लेखा, कब तक जीवन जियेगा यूँ करके सब अनदेखा। विकास तंवर सन 02में जब ऐसा हाल विचारा था, तब लेखन की मेरी आयु ना थी कागज पे नहीं उतारा था,फिर भी पढ़ाई फोन से होगी ,खरीदारिया लोन पे होंगी, एक कॉपी में लिख डारा था, जिसे पढ़ा भविष्य के एक अध्यापक ने ओर बार बार ये पुकारा था क्या सचमुच ऐसा होगा या यूं ही तुक्का मारा था,। जब 20 में दुकाने बन्द हो गई, चींटी झूम चंद हो गई, फिर वही विचार-विचारा था, फोन पे मुझे बताया उसने, ये सब तो है वैसा ही जैसा विचार तुम्हारा था 'कालेज के दिन 'एक लेख में विकास तंवर लिखडार...

कविताओं में छुपा जीवन -हस्ती है

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विकास तंवर खेेेड़ी