#कविता- विकास तंवर खेडी *****।।।प्रकृति को ना छेड़ो विचार करो।।।*****


विचार कभी न खत्म होते एक बहुमस्तिक के परपार हुआ, 
विचार पे अति मनुज कर ली तब नया नया आविष्कार हुआ,
उसी में आई विभिन्नता ओर मेहनत तो सुंदर सृष्टि का अवतार हुआ,
ओर अगन लगी जब इसमे तो जग में हा हा कार हुआ,

जाल बनाने वाले ने वृहद मे न कोई डोर भी बहार करी, 
मनुज जीव की बनी दुनिया मानव के हाथ में सौंप धरि, 
इसी जाल के स्वामी ने जाल में ही रहगुजर करि, 
मैन ने मंदिर मस्जिद घर लिए नहि जाल पे कभी गौर करि,।
मसीन बना ली लाखोँ इनका ही फिर गुलाम हुआ,

फिर द्वंद क्रंति लाएगा, क्या ये पढ़े लिखो का काम हुआ,
इस लबादे से पत्तों के वस्त्र थे अछे, मानव उनसे भी तू बाहर हुआ,
जहर उगा फसलों में नोचि प्रकृति खुद बी खरपतवार हुआ,
चक्र कर्म चलता है सब पर गौर विचार करो, नव उत्पति विनास से होती है इस पर भी कभी ध्यान धरो,
आधुनिकता में समावेशित रीत संस्कार यही चित में धरो, 
जो सत्य लिखा वेदों में वो जीवन अंगीकार करो।

कर सकते हो थोड़ा बहुत मानव जीवन पे विचार करो,

प्रकृति को यूं न छेड़ो अपने अंदर ही सुधार करो।
# विकास तंवर खेड़ी०*०*०*०
#vikash tanwar kheri
# Poem विकास तंवर खेड़ी 

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